Section A
Q1. निम्नलिखित काव्यांशों की लगभग 150 शब्दों में ऐसी व्याख्या कीजिए कि इसमें निहित काव्य-मर्म भी उद्घाटित हो सके:
(a)
कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव।
सूनें घर का पाहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव ॥
कबीर चित चमंकिया, चहुं दिसि लागी लाइ ।
हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ ॥
(b)
खेलन सिखए, अलि, भलै चतुर अहेरी मार।
कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार ॥
लख्यो सुमतु ह्रै है सफलु, आतप-रोसु निवारि ।
बारी, बारी आपनी सींचि सुहृदता-बारि ॥
(c)
जिसकी प्रभा के सामने रवि-तेज भी फीका पड़ा,
अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा!
मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले,
मानो सभी जन ईश की ज्योतिश्छटा में थे मिले ॥
(d)
शोषण की शृंखला के हेतु बनती जो शांति,
युद्ध है, यथार्थ में, व' भीषण अशांति है;
सहना उसे हो मौन, हार मनुजत्व की है,
ईश की अवज्ञा घोर, पौरुष की श्रांति है;
पातक मनुष्य का है, मरण मनुष्यता का,
ऐसी शृंखला में धर्म विप्लव है, क्रांति है।
(e)
अलस अँगड़ाई लेकर मानो जाग उठी थी वीणा :
किलक उठे थे स्वर-शिशु ।
नीरव पद रखता जालिक मायावी
सधे करों से धीरे-धीरे
डाल रहा था जाल हेम तारों का ।