Section A
Q1. निम्नलिखित काव्यांशों की लगभग 150 शब्दों में ऐसी व्याख्या कीजिए कि इसमें निहित काव्य-मर्म भी उद्घाटित हो सके:
(a)
प्रकृति जोई जाके अंग परी।
स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी।
जैसे काग भच्छ नहिं छाँड़ै जनमत जौन घरी।
धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी ।
ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि धरी।
सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ।।
(b)
सुन् रावन ब्रह्मांड निकाया । पाइ जासु बल बिरचति माया ।
जाके बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ।
जा बल सीस धरत सहसासन । अंडकोस समेत गिरि कानन ।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता । तुम्ह से सठन सिखावनु दाता ।
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।
(c)
पावक सो नयननु लगै जावकु लाम्यो भाल ।
मुकुरु होहुगे नैंक मैं, मुकुरु बिलोको लाल ।।
तखिन-कनकु कपोल-दुति बिच ही बीच बिकान।
लाल लाल चमकति चुनीं चौका-चीन्ह-समान ।।
(d)
उषा की पहिली लेखा कांत,
माधुरी से भींगी भर मोद;
मदभरी जैसे उठे सलज्ज
भोर की तारक-द्युति की गोद।
(e)
अवतरित हुआ संगीत स्वयंभू
जिसमें सोता है अखण्ड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय ।