High Court Uttarakhand 2014 ARO Typist Hindi Paper 2 – Questions & Repair OCR

Uttarakhand Government Jobs Other Jobs 2024

  • Year 2024
  • Conducted By High Court Uttarakhand
  • Questions 3
  • Maximum Marks 200
  • Duration तीन घण्टे] सभी प्रश्न अनिवार्य हैं । नोट<math>:</math> Hours
  • Languages Hindi & English

Exam Details

Detail Information
Examination HIGH COURT 2014 ARO TYPIST MAIN
Year 2024
Conducting Body High Court Uttarakhand
Paper Hindi Paper 2 (Main) / ARO Typist
Subject Hindi / General Studies (Language and Essay)
Duration तीन घण्टे] सभी प्रश्न अनिवार्य हैं । नोट<math>:</math> Hours
Maximum Marks 200
Number of Questions 3
Question Type Descriptive / Subjective

This SEO extract consolidates pages 1 and 2 of the Uttarakhand High Court 2014 ARO Typist Main examination papers (Hindi Paper 2). Page 1 provides exam metadata, duration (3 hours), total marks (200), and compulsory question instruction. The questions on page 1 include a word-meaning and proverb/synonym exercise with a 5-mark allocation. Page 2 (repair OCR) presents three descriptive questions: Q2 (essay) on topics such as education, women’s empowerment, democracy and press freedom, poverty justice, and India’s role in global trade with ~750 words; Q3 a long-form problem-analysis essay with a 20-mark value; and additional instruction fragments. This combined content enables comprehensive SEO metadata, topic tagging, and FAQ generation for the quiz, while preserving line breaks and proper numbering as per repair rules.

Major Topics Covered

  • Hindi Essay Writing
  • General Knowledge
  • Proverbs and Idioms
  • Synonyms and Antonyms
  • Vocabulary Development
  • Reading Comprehension
  • Information Technology in Rural Development
  • Education and Women Empowerment
  • Democracy and Press Freedom
  • Poverty and Justice
  • World Trade and India's Role
  • Problem Solving
  • Critical Thinking
  • Hindi Grammar
  • Public Administration
  • Language Skills
  • Competitive Exam Preparation
  • Gk for Exams
  • Current Affairs
  • General Language Abilities

Why This Paper is Important

  • Useful for HIGH COURT 2014 ARO TYPIST MAIN preparation
  • Helps understand the latest exam pattern
  • Useful for practice and self-assessment
  • Covers frequently asked General Studies topics
  • Helpful for analysing question trends

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Instructions

  • प्रश्न-पत्र-11 [ पूर्णांक : 200 निर्धारित समय : तीन घण्टे] सभी प्रश्न अनिवार्य हैं ।
  • (ii) प्रत्येक प्रश्न के अंक उसके अन्त में इंगित हैं ।
  • (iii) एक प्रश्न के सभी भागों का उत्तर अनिवार्यत: एक साथ दिया जाए ।
  • (iv) पत्र लेखन सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में अपना नाम, पता तथा अनुक्रमांक न लिखें ।
  • यदि अनिवार्य हो तो क्ष. त्र. ज्ञ लिख सकते हैं ।
  • निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच शब्दों से वाक्य निर्मित कोजिए : 5 \times 1 = 5
  • (i) उडती चिडिया पहचानना
  • (ii) कान में तेल डालना
  • (iv) पापड़ बेलना हाथ कंगन को आरसी क्या
  • (vi) नाच न जाने आँगन टेड़ा
  • (vii) खूँटे के बल बछड़ा कूदे
  • (viii) अथजल गगरी छलकत जाए निम्नलिखित शब्दों में से किन्हीं पाँच का एक-एक पर्यायवाची शब्द लिखिए : (1) 5 \times 1 = 5 अनिल, विहंग, केवट, शाखामृग, पल, डोली, निखिल, धूल निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच शब्दों के विलोम लिखिए : (5) 5 \times 1 = 5 ऋजु, बहिर्मुखी, विज्ञ, अर्ह, प्रवर, अनृत, गुरु, चिरायु UNK-02

Questions (page 2)

Q1. 1.

(ज) कोजिए : अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना
(i) उडती चिडिया पहचानना
(ii) कान में तेल डालना
(iii) (iv) पापड़ बेलना हाथ कंगन को आरसी क्या
(v) (vi) नाच न जाने आँगन टेड़ा
(vii) खूँटे के बल बछड़ा कूदे निम्नलिखित शब्दों में से किन्हीं पाँच का एक-एक पर्यायवाची शब्द लिखिए :
(1) अनिल, विहंग, केवट, शाखामृग, पल, डोली, निखिल, धूल
निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच शब्दों के विलोम लिखिए :
(5) ऋजु, बहिर्मुखी, विज्ञ, अर्ह, प्रवर, अनृत, गुरु, चिरायु

Q2. 40 ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका
(i) शिक्षा और महिला सशक्तीकरण
(ii)
(iii) लोकतंत्र में प्रेस की स्वाधीनता
(iv) निर्धनों के लिए न्याय
(v) विश्व-व्यापार में भारत का योगदान निम्नलिखित गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए तथा मूल गद्यांश की शब्द-संख्या के एक-तिहाई में सारांश तैयार
3. कोजिए : 5 + 15 = 20 हम किसी समस्या पर जितना अधिक विचार करते हैं, उसके लिए जितनी अधिक विवेचना, विश्लेषण और विमर्श करते हैं, वह उतनी ही अधिक जटिल होती जाती है । तो क्या किसी समस्या को उसके संपूर्ण और समग्र रूप में देखा जाना संभव है ? कैसे संभव है यह ? क्योंकि हमें लगता है कि यही हमारी प्रमुख कठिनाई है। हमारी समस्याएँ दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जा रही हैं। युद्ध का खतरा सिर पर मँडरा रहा है। हमारे संबंधों में हर प्रकार का विक्षोभ घुसपैठ कर रहा है । इस सबको हम संपूर्ण-समाविष्ट रूप में, समग्र रूप में कैसे समझ सकते हैं ? यह तो स्पष्ट है कि किसी समस्या का समाधान तभी संभव है, जब हम उसे संपूर्ण-समग्र रूप में देखें; न कि टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित करके । ऐसा कब संभव है ? निश्चय ही, यह तभी संभव है, जब अहं एवं परंपरा, संस्कार, पूर्वाग्रह, प्रत्याशा एवं हताशा की पृष्ठभूमि में अपनी जड़े जमाए बैठी विचार पक्रिया का अंत हो जाए । क्या हम इस अहं को समझ सकते हैं - वस्तुस्थिति का विश्लेषण करके नहीं, बल्कि उसे प्रत्यक्ष देखकर; सिद्धांत रूप में स्वीकार करके नहीं, बल्कि उसकी वास्तविकता के प्रति सजग रहकर; कोई परिणाम पा लेने हेतु इस अहं का अंत करने की चाहत से नहीं, बल्कि इस सतत सक्रिय अहं को गतिविधियों का अवलोकन करते रहने से ? क्या हम इसे पूरे ध्यान से देख सकते हैं – इसे ध्वस्त या प्रोत्साहित करने की कोई हरकत किए बिना ? समस्या तो यही है, है न ? यदि हम सभी में महत्त्व, प्रतिष्ठा, अधिकार, निरंतरता, आत्म-संरक्षण की लालसा वाले अहं का अस्तित्व ही शेष न रहे तो निश्चय ही हमारी समस्याओं का अवसान हो जाएगा । यह अहं एक ऐसी समस्या है, जिसका निदान विचार नहीं कर सकता । एक ऐसी सजगता चाहिए, जो विचारजनित न हो । सजग रहना, इस अहं की गतिविधियों को उचित-अनुचित ठहराए बिना, केवल उनके प्रति जागरूक रहना यही पर्याप्त है । यदि आप इस आशय से जागरूक हैं कि ‘कैसे’ समस्या का समाधान किया जाए, ‘कैसे’ इसे रूपांतरित किया जाए, ‘कैसे’ कोई परिणाम प्राप्त किया जाए, तब तो यह जागरूकता अहं की परिधि में ही रहेगी । जब हम कोई परिणाम प्राप्त कर लेना चाहते हैं, चाहे वह विश्लेषण द्वारा हो, सजगता द्वारा हो या प्रत्येक विचार को निरंतर जाँच-परख द्वारा हो, तब भी हम विचार की परिधि में ही रहते हैं, जो कि स्वयं ‘मैं’ की, ‘अहं’ की परिधि में स्थित है । अत: हम कह सकते हैं कि विचार अहं की समस्या को नहीं सुलझा सकता। मन में गतिविधि चल रही है, हलचल हो रही है तो समझो, विचार सक्रिय है । इसके प्रशमन के बिना प्रेमोदय संभव नहीं है । जब तक मन की गतिविधि विद्यमान रहती है, तब तक प्रेम हो ही नहीं सकता । और जब प्रेप विद्यमान होगा, तब हमारी कोई सामाजिक समस्या नहीं रह जाएगी । 2

Q3. 3. कोजिए : 5 + 15 = 20
हम किसी समस्या पर जितना अधिक विचार करते हैं, उसके लिए जितनी अधिक विवेचना, विश्लेषण और विमर्श करते हैं, वह उतनी ही अधिक जटिल होती जाती है । तो क्या किसी समस्या को उसके संपूर्ण और समग्र रूप में देखा जाना संभव है ? कैसे संभव है यह ? क्योंकि हमें लगता है कि यही हमारी प्रमुख कठिनाई है। हमारे संबंधों में हर प्रकार का विक्षोभ घुसपैठ कर रहा है । इस सब को हम संपूर्ण-समाविष्ट रूप में, समग्र रूप में कैसे समझ सकते हैं ? यह तो स्पष्ट है कि किसी समस्या का समाधान तभी संभव है, जब हम उसे संपूर्ण-समग्र रूप में देखें; न कि टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित करके । ऐसा कब संभव है ? निश्चय ही, यह तभी संभव है, जब अहं एवं परंपरा, संस्कार, पूर्वाग्रह, प्रत्याशा एवं हताशा की पृष्ठभूमि में अपनी जड़े जमाए बैठी विचार पक्रिया का अंत हो जाए । क्या हम इस अहं को समझ सकते हैं - वस्तुस्थिति का विश्लेषण करके नहीं, बल्कि उसे प्रत्यक्ष देखकर; सिद्धांत रूप में स्वीकार करके नहीं, बल्कि उसकी वास्तविकता के प्रति सजग रहकर; कोई परिणाम पा लेने हेतु इस अहं का अंत करने की चाहत से नहीं, बल्कि इस सतत सक्रिय अहं को गतिविधियों का अवलोकन करते रहने से ? क्या हम इसे पूरे ध्यान से देख सकते हैं – इसे ध्वस्त या प्रोत्साहित करने की कोई हरकत किए बिना ? समस्या तो यही है, है न ? यदि हम सभी में महत्त्व, प्रतिष्ठा, अधिकार, निरंतरता, आत्म-संरक्षण की लालसा वाले अहं का अस्तित्व ही शेष न रहे तो निश्चय ही हमारी समस्याओं का अवसान हो जाएगा । यह अहं एक ऐसी समस्या है, जिसका निदान विचार नहीं कर सकता । एक ऐसी सजगता चाहिए, जो विचारजनित न हो । सजग रहना, इस अहं की गतिविधियों को उचित-अनुचित ठहराए बिना, केवल उनके प्रति जागरूक रहना यही पर्याप्त है । यदि आप इस आशय से जागरूक हैं कि ‘कैसे’ समस्या का समाधान किया जाए, ‘कैसे’ इसे रूपांतरित किया जाए, ‘कैसे’ कोई परिणाम प्राप्त किया जाए, तब तो यह जागरूकता अहं की परिधि में ही रहेगी । जब हम कोई परिणाम प्राप्त कर लेना चाहते हैं, चाहे वह विश्लेषण द्वारा हो, सजगता द्वारा हो या प्रत्येक विचार को निरंतर जाँच-परख द्वारा हो, तब भी हम विचार की परिधि में ही रहते हैं, जो कि स्वयं ‘मैं’ की, ‘अहं’ की परिधि में स्थित है । अत: हम कह सकते हैं कि विचार अहं की समस्या को नहीं सुलझा सकता। मन में गतिविधि चल रही है, हलचल हो रही है तो समझो, विचार सक्रिय है । इसके प्रशमन के बिना प्रेमोदय संभव नहीं है । जब तक मन की गतिविधि विद्यमान रहती है, तब तक प्रेम हो ही नहीं सकता । और जब प्रेप विद्यमान होगा, तब हमारी कोई सामाजिक समस्या नहीं रह जाएगी ।

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Frequently asked questions

What is the total maximum marks for the paper?

200

Are all questions compulsory?

Yes, as per the exam instructions on Page 1.

Which language(s) does the paper use?

Hindi (with English as a possible companion language in sections).

How many questions are in this paper?

Three questions (Q1, Q2, Q3) are shown across Page 1 and Page 2.

What is the marks distribution for Q1?

5 marks.

What type are Q2 and Q3?

Descriptive/essay style questions.

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