Q1.
निम्नलिखित लेखांश का एक-तिहाई शब्दों में संक्षेपण कीजिए एवं उसके लिए एक उपयुक्त शीर्षक भी सुझाइए :
Please make a precis of the following passage in about one-third of its length and suggest a suitable title for it:
(a)
इस देश का लगभग प्रत्येक नागरिक वस्तुओं अथवा सेवाओं या दोनों का उपभोक्ता है । उपभोक्ताओं की इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए उन्हें देश में एक सशक्त लॉबी बना लेनी चाहिए थी और उन्हें एक ऐसी ताकत के रूप में उभरना चाहिए ताकि वस्तु आपूर्तिकर्ता और सेवा प्रदाता भी उनका ध्यान रख सकें । उनके संदर्भ में आवाज उठाने वाले प्रभावी संगठन और सामंजस्य के अभाव में भारत में एक उपभोक्ता कुल मिलाकर ग़ैर-प्रातिनिधिक, मूक और दंतहीन रहा है। उसे जो मिला उसने स्वीकार कर लिया । पिछले कुछ वर्षों में, जैसा कि बाज़ार का विस्तार हुआ है प्रतिस्पर्धा के कुछ तत्त्व और खुदरा क्षेत्र में चयन के कारण धनी और उच्च-मध्य वर्ग के उपभोक्ताओं के पक्ष में चीज़ें कुछ बदल सकती हैं । तथापि औसत मध्य वर्गीय उपभोक्ताओं और ग़रीब वर्ग के उपभोक्ताओं की स्थिति कुल मिलाकर दयनीय रही है क्योंकि उनकी शिकायतों को सुनने और शिकायतों के निवारण के लिए व्यावहारिक रूप में कोई तंत्र नहीं है।
1976 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अवलोकन किया कि उपभोक्ता संरक्षण समाज की आवश्यकता थी । उसमें कहा गया है : “हम आशा करते हैं कि सतर्क विधायिका, कानून और छोटे आदमी की ओर से खुद को सक्रिय करेगी और बहुत गतिमान तथा आसानी से सुलभ और नि:शुल्क उपभोक्ता संरक्षण उपाय करेगी ।”
हालाँकि उपभोक्ता आंदोलन भारत में सन 1960 के दशक में विकसित होने लगा था पर इसने 1980 के दशक के अंत में एक निश्चित आकार ग्रहण करना शुरू किया । 1982 में उपभोक्ता संरक्षण पर एक एशियाई संगोष्ठी आयोजित की गई जिसमें एशियाई देशों के 300 प्रतिनिधियों ने भाग लिया । इस ऐतिहासिक उपभोक्ता आंदोलन को ध्यान में रखते हुए भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री ने उपभोक्ता संरक्षण को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया और राष्ट्रीय कार्यसूची के रूप में रखा । पहली बार उपभोक्ता संरक्षण के लिए कानून बनाने की आवश्यकता अनुभव की गई । इसके परिणामस्वरूप संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया गया और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (1986 का 68) बनाया गया । 1988 तक जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य-स्तरीय आयोग और उपभोक्ता शिकायतों के निवारण के लिए राष्ट्रीय आयोग का एक त्रिस्तरीय ढाँचा कायम किया गया ।
हमारे देश का कटु यथार्थ यह है कि आम आदमी के लिए अभियोग बहुत महँगा और समय लेने वाला है और इसलिए न्याय पाना उसके लिए दु:स्वप्न के अनुभव की तरह है । उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम आम आदमी के बचाव के लिए लाया गया है । इसके माध्यम से उपभोक्ताओं के लिए अपेक्षाकृत सस्ता और त्वरित न्याय का मंच उपलब्ध करवाया गया है। आरंभ में, लगभग दो दशकों तक, कोई न्यायालय शुल्क नहीं था । अब, हालाँकि शिकायत दर्ज करने के लिए मामूली शुल्क का प्रावधान किया गया है । शिकायतकर्ता को किसी वकील की सेवाएँ लेने की आवश्यकता नहीं है और एक मेल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है । शिकायत निपटान के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान है और प्राविधिकता से दूर रखा गया है । उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत प्रमुख लक्ष्य उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण और प्रोत्साहन करना है, जैसे :
(a) उन उत्पादों से सुरक्षा जो जीवन तथा संपत्ति को हानि पहुँचा सकती हैं;