Q1. निम्नलिखित लेखांश का लगभग एक-तिहाई शब्दों में संक्षेपण कीजिए एवं इसके लिए एक उपयुक्त शीर्षक भी सुझाइए :
(a)
लैंगिक समानता प्रथम और प्रमुख मानवाधिकार मुद्दा है। एक महिला को यह अधिकार है कि वह गरिमा और आजादी के साथ रहे। विकास को आगे बढ़ाने और गरीबी को कम करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना अपरिहार्य है। सशक्त महिलाएँ परिवारों और समुदायों के स्वास्थ्य और उत्पादकता में योगदान करती हैं और अगली पीढ़ी के लिए संभावनाओं में सुधार करती हैं। डॉ॰ बी॰ आर॰ अम्बेडकर ने कहा है, ‘‘मैं किसी समुदाय की प्रगति को इस बात से मापता हूँ कि महिलाओं ने कितनी प्रगति की है।’’
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार महिला सशक्तिकरण के पाँच घटक हैं : उनका आत्ममूल्य का बोध; विकल्प निर्धारित करने का अधिकार; अवसरों और संसाधनों तक पहुँच का अधिकार; घर के अंदर और बाहर दोनों जगह उनकी स्वयं की जिंदगी को नियंत्रित करने का अधिकार; तथा अधिक न्यायसंगत सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था बनाने के लिए सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने की क्षमता। लैंगिक समानता आठ सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों में से एक है।
भारतीय शास्त्रों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा दिया गया है। ‘सहधर्मिणी’ शब्द, जिसका अर्थ है समान भागीदार, वैदिक काल से जाना जाता है। अतः प्राचीन काल में भारतीय महिलाओं को आदर और सम्मान प्राप्त था। उन्हें अपना जीवन-साथी चुनने का अधिकार था और निर्णय लेने का अधिकार भी। उपनिषदों में भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक आत्मा न तो स्त्री है और न पुरुष।
धीरे-धीरे लैंगिक समानता की परंपरा का ह्रास होना शुरू हुआ और समाज में असमानता फैलने लगी। लगभग हर देश में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज ने उनकी आजादी को दबाया है। महिलाओं को उनके घरों में कैद कर दिया गया ताकि वे मतदान न कर सकें अथवा अपने विचार भी सामने न रख सकें। भारत में बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियाँ भी महिलाओं के विरुद्ध शुरू हो गयीं। आशा की एक किरण दिखाई दी जब राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर उभरकर सामने आए और महिलाओं के अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाई। राष्ट्रीय परिदृश्य में गाँधीजी के उदय के बाद सरोजिनी नायडू, कल्पना दत्त, उषा मेहता आदि महिलाओं ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इसके बाद हुए कुछ आंदोलनों, विरोधों और क्रांतियों ने महिलाओं के हितों को आगे बढ़ाया।
इसके बाद किए गए अनेक उपायों के बावजूद, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव-लिंग-आधारित हिंसा, आर्थिक भेदभाव, प्रजनन स्वास्थ्य असमानताएँ और हानिकारक पारंपरिक प्रथाएँ—अभी भी असमानता का सबसे व्यापक और स्थायी रूप बना हुआ है। प्रतिदिन बढ़ती घरेलू हिंसा और बलात्कार आदि के साथ-साथ हिंसा और सुरक्षा, महिलाओं के लिए प्रमुख खतरे हैं। उन्हें समान कार्य के लिए पुरुष से कम वेतन दिए जाने के अनुचित व्यवहार का भी शिकार होना पड़ता है।
विकास प्रक्रिया में पूरी तरह से भाग लेने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और आत्मविश्वास के साथ महिला को सशक्त बनाने के लिए शिक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है। अमरीका के धार्मिक और राजनीतिक नेता ब्रिघम यंग ने कहा है कि ‘‘आप एक महिला को शिक्षित करते हैं; आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं।’’ मानव अधिकारों के सार्वजनिक घोषणापत्र में बल दिया गया है कि ‘‘प्रत्येक को शिक्षा का अधिकार है’’। लेकिन विश्व के अधिकांश क्षेत्रों में, महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा औपचारिक शिक्षा कम दी जाती है और उनके ज्ञान, क्षमताओं और मुकाबला करने के तंत्र को अक्सर पहचान नहीं मिलती। उल्लेखनीय प्रयासों के बावजूद, दुनिया के एक-तिहाई से अधिक वयस्कों, ज्यादातर महिलाओं, की पहुँच मुद्रित ज्ञान, नए कौशल या प्रौद्योगिकियों तक नहीं है जो उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करें।
महिला सशक्तिकरण समय की माँग है ताकि वे स्वयं के लिए आवाज उठा सकें और अन्याय का शिकार न हो पाएँ। महिलाओं की स्वायत्तता और सशक्तिकरण तथा उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य स्तर में सुधार, सतत विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। प्रजनन जीवन, बच्चों की देखभाल और पालन-पोषण तथा गृहस्थी के प्रबंधन में पति और पत्नी दोनों की पूर्ण भागीदारी और साझेदारी आवश्यक है।