Q1. Make a précis of the following passage in about one-third of its length and suggest a suitable title for it:
(a)
वैश्विक मंदी कुछ ऐसी प्रतीत होती है कि जो भारत के प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में छाई हुई है । वैश्विक मंदी के विचार से उद्योग और सामान्य व्यक्ति सभी जगह भयातुर दिखते हैं और जब विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था संयुक्त राज्य अमेरिका में ऐसी प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है । औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, रोजगार के अवसरों में कमी और व्यय में कमी जैसे दूसरे आयाम हैं जो लोगों के बीच व्यापक चर्चा का हिस्सा हैं । लेकिन क्या संयुक्त राज्य अमेरिका की अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने से भारतीय अर्थव्यवस्था को चिंतित होने की आवश्यकता है ? क्या अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, या यथावत जारी रहेगी ?
भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंदी के प्रभाव को समझने के लिए हमें सर्वप्रथम मंदी के तकनीकी अर्थ को समझना चाहिए । इसका आशय है अर्थव्यवस्था का तीव्र गति से धीमी होना जिसमें लगातार दो तिमाहियों में सकल राष्ट्रीय या घरेलू उत्पाद में गिरावट शामिल है । मंदी के सामान्य लक्षण हैं — राष्ट्रीय उत्पाद में गिरावट, बेरोजगारी में वृद्धि और ब्याज दरों में तीव्र कमी । ब्याज दरों में इस कमी के फलस्वरूप पैसे की माँग में कमी आ जाती है । अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार मंदी एक प्राकृतिक घटना है । एक अर्थव्यवस्था जो लंबे समय से विकासमान रही है उसमें गिरावट एक सामान्य अर्थशास्त्रीय चक्र है ।
सामान्यत: अर्थव्यवस्था की मंदी के समय उपभोक्ता में आर्थिक विकास के प्रति विश्वास में कमी होने से व्यय करने में कमी आ जाती है । अल्प व्यय अर्थव्यवस्था पर चाक्रिक प्रभाव डालता है जिससे वस्तुओं एवं सेवा क्षेत्र की माँग में कमी हो जाती है । इस कारण उत्पादन में गिरावट आ जाती है जिससे बेरोजगारी में त्वरित वृद्धि हो जाती है । फलत: लोग व्यय कम करते हैं और इस प्रकार यह चक्र चालू हो जाता है । इसी प्रकार निवेशक भी, स्टॉक कीमतों में गिरावट के भय से कम खर्च करते हैं । अत: इस नकारात्मक भावना से स्टॉक मार्केट में गिरावट दर्ज की जाती है ।
कहना न होगा कि वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था इस प्रक्रिया से गुज़री है । उस समय अर्थव्यवस्था की विकास दर 5.5% पर देखी गई जो 2006 से पूर्व के तीन वर्षों में 8% पर थी ।
विश्व भर के विकसित राष्ट्र अपना सर्वोत्तम प्रयास कर रहे हैं कि मंदी को अनवरत प्रक्रिया न बनने दें जिससे महामंदी उत्पन्न होती है । उनके अनुसार मंदी केवल दो तिमाही तक सीमित रहती है जबकि महामंदी भयावह आर्थिक गिरावट है जो वर्षों तक बनी रहती है । भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतर्निहित होने के कारण इस पर वैश्विक महामंदी का प्रभाव कम पड़ा । कारण स्पष्ट है — आंतरिक उपभोग पर निर्भर रहना, बचत और आयात का प्रतिस्थापन । जैसा कि कहा जाता है कि प्रथम पीढ़ी के सुधारों के अंतर्गत 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक खिलाड़ियों के लिए खुली, वस्तु और सेवा क्षेत्र में भागीदारी से सकल घरेलू उत्पाद में तीव्र विकास हुआ । फलत: वैश्विक बाज़ार पर निर्भरता बढ़ी और भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार से स्वयं को अलग नहीं रख पाया । फिर भी, आरंभिक दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था पर उक्त संकट का कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा । बल्कि इस संकट का आरंभिक प्रभाव सकारात्मक रहा जिससे कि जनवरी 2008 तक भारत के विदेशी निवेश में भारी बढ़ोत्तरी हुई । यह इस विश्वास के कारण संभव हुआ कि उक्त संकट से विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ अधिकांश रूप से अप्रभावी रहेंगी । लेकिन शीघ्र ही यह विश्वास ग़लत सिद्ध हुआ ।