Q1. निर्देश (प्रश्न संख्या 1 से 5 तक) : निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प का चयन करके उत्तर पत्रक में चिह्नित कीजिए । जो पुरुष फल की कामना रखकर काम आरंभ करते हैं, उन्हें फल जब निकट होता है, तब उनका उत्साह बढ़ जाता है और जब उन्हें फल दूर ज्ञात होता है तब उनका उत्साह कम हो जाता है। इस प्रकार उनके उत्साह में निरंतर अंतर आता रहता है। इसके विपरीत जो पुरुष फल की इच्छा न रखकर केवल काम करने को ही अपना कर्त्तव्य मानकर काम करने में जुट जाते हैं, उन्हें अपनी असफलता पर कोई दुःख नहीं होता और इस प्रकार उनके उत्साह में कोई अंतर नहीं आता और वह सदा एक-सा रहता है। इसलिए जब फल को चाहने वाले व्यक्ति को असफलता मिलती है तब वह दुःखी होता है और कर्म करने को ही अपना कर्त्तव्य मानकर कर्म करने वाले उत्साही को असफलता मिलती है, वह दुःखी नहीं होता और केवल उसकी वही दशा हो जाती है जो काम आरंभ करते समय थी । इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि दूसरे प्रकार के मनुष्यों का उत्साह ही सच्चा उत्साह है और पहले प्रकार के मनुष्यों का उत्साह वास्तविक उत्साह नहीं है, वह भी एक प्रकार का लोभ कहा जा सकता है । जिस प्रकार लोभी मनुष्य को अपने उद्देश्य के न प्राप्त होने पर दु:ख होता है, उसी प्रकार इन लोगों को भी असफल होने पर दु:ख की प्राप्ति होती है । अत: इस उत्साह को लोभ कहना ही उचित है।
- (a) सच्चे उत्साही में
- (b) मेहनती मनुष्य में
- (c) फलासक्त उत्साही में
- (d) लोभयुक्त उत्साही में